Tuesday, 7 June 2016

पापा : बिना चीनी की चाय..

अस्ताचलगामी होते सूर्य को उन्हें देखते देखा,
मन एक बारगी सिहर उठा,
सूर्यास्त की किरणें उनपर पड़ रही थी,
आँखो पर पड़ी झुर्रियाँ चेहरे ही नहीं आयु की थकान भी बता रही थी,
वो भी तो अब थक गए होंगे,
न जाने ऐसे कितने सूर्योदय ओर सूर्यास्त उन्होंने देखे होंगे,
हर सुबह उनकी बिना चीनी की चाय,
हाथ में अखबार,
घर में उनकी आवाज़ की झंकार,
कभी महसूस ही नहीं हुआ,
कि उम्र का दुसरा पड़ाव वो पार कर गए,
मेरे पिता भी अब ढ़ल रहे हैं,
शायद किवाड़ की ओट से ताकता ये जाने कबतक सोचता रहi मैं,
डुबते सूर्य की ओर चुपचाप देखना उनका आज नहीं भाया मुझे,
नहीं कह पायi कभी उनसे कि,
बिना चीनी की चाय संग उनके कई बार चुपके से पीता हूँ मैं..
पापा ,आपको बहुत प्यार करता हूँ मैं.

सुनो वो तुम हो जिससे मै बात करती थी....

जिन्हें दिन रात हम यू तड़प कर याद करते है
कभी सोचा ना था मिलने पे वो हमसे नाम पुछेगे..

"सुनो वो तुम हो जिससे मै बात करती थी..
कभी रस्ते पे मिलते थे? कभी तुम पीछा करते थे?
जिसे मै पागल समझती थी और अक्सर मुस्कुराती थी
वो पिछली सीट पे बैठे जो अक्सर घुरा करता था ..
कभी जो आँख मिल जाये तो सरमा सा जाता था,
वो जिसको देखकर सारी सहेलियाँ बात करती थी
वो अक्सर बात करती थी "तेरा पागल नहीं आया ..
कभी मै टाल देती थी कभी मै मुस्कुराती थी
वो जिसको देख कर मै अक्सर कुछ भूल जाती थी ..
अब आये हो तो कहते हो तुम्हें मै प्यार करता था..
हाँ पागल था दिवाना था कभी कुछ बोल ना पाया ..

चलो अब छोड़ भी दो बात बचपन की पुरानी है
समय तेज़ी से यू बदला की अब बातें पुरानी है
थी उमर बस सोलह की ,बात उसकी निराली थी
उसे क्या याद करना जो कभी वापस न आयेगा ..
बस रहने दो ..चलो छोड़ो ,पर अच्छा ये बताओ तो
वो मेरे घर के मोड़ के आगे एक मन्दिर भी आता था?
तुम उसके आगे को जाते थे, मै अक्सर सोचा करती थी
कभी पुछा नहीं कि कितने पास रहते हो कि कितनी दूर जाते हो,
तुम्हारा यू मेरे घर होली पे आ जाना
मेरी साँसों का रूक जाना अभी भी याद आता है ,
तुम पागल थे ? किसी के घर कोई एेसे भी जाता है
अभी भी सोचती हु तो अक्सर काँप जाती हु
वो मेरा भईया था जो बात दब गयी वरना
मेरे जो बाप से मिलते मोहब्बत भूल जाते तुम

अरे हाँ वो greeting card का क़िस्सा
भी कितना बचकाना था ,
पूरे स्कूल में मैंने उसे सबसे छिपाया था
तुम्हारी चोकलेट जो थी मै ही नहीं खायी

चलो अच्छा कभी मिलना तो तुम फिर से देदेना
मै अबकी बार उसको खा के देखुंगी ,
तुम्हारा प्यार मीठा था, क्या अब भी उतना ही मीठा है .

चलो अच्छा लगा कि तुम लौट आये हो
तुम्हारे साथ बचपन की यादें लौट आयी तो

कभी बैठेंगे तो तुमको तो फिर बतायेंगे
बड़ी ही मुश्किलों के पार जीवन को बसाया है
दो छोटे फ़ूल है बगीया में जिनको सजाया है
उन्हीं को सींचना है और उनको बनना है

सुनो .....अच्छा चलो सब भूल जाओ अब
मुझे एक बात कहनी है -जो जीवन से है सीखी  ..

ये जीवन है यहाँ एेसे ही होता है
जिन्हें हम चाहते है वो अक्सर दुर होता है

फिर मिलेंगे ... किसी मोड़ पे ..तब तक खुश रहो ..

शादी की सालगिरह मुबारक...

शादी की सालगिरह मुबारक......!
(एक मित्र ने कहा तुम मुझे कुछ लिखकर दो.... मेरी शादी की सालगिरहा है........)

'एक नई' लाल सुर्ख जरी से कढ़ी साड़ी से बंधी सजी कहानी के पहले पन्ने से लिखते पढ़ते ...
कभी आटे में पानी सी घुली, गूँदी बेली...
कभी सर्दी गर्मी के बिखरे समेटे कपड़ों में उलझी सुलझी.... धूप ढूंढ तो कभी छांव में फैलाई...
कुछ बंद बक्से सी, कुछ खुली अलमारी या फिर कार की एन मौके खोयी चाबियों सी....
कभी कपड़ों पर चम्मच से गिरे दाग पर खुलकर हँसती...
बिस्तर पर फैले बिखरे कोट और पेंट पर लड़ती रूठती...
'तुम्हें पहाड़ों पर जाने की ज़िद और मुझे समंदर तक...',और न जाने कितनी ऐसी ही छोटी छोटी बातों पर बहस कभी खींची,
कभी हंस कर खत्म की है .......
बड़ी बात कब कह पाये हम एक दूसरे से......
कितने फांसले तय कर लेते हें दो अजनबी उस एक रोज़ के बाद....
उस रोज़ से फिर हर रोज़ और इस रोज़ तक लिखी हर छोटी बड़ी स्मृति मुबारक.......
तुम्हें शादी की सालगिरह मुबारक.....
सच ये की तुम्हारे साथ बच्चों से सपने ले 'जी' है ज़िंदगी......
जिसमें कभी रूठी तो कभी मनाई है ज़िंदगी...
ये दिन बहुत भला लगता है.... इस रोज़ मुझे तुम जो मिले हो .....
इस रोज़ एक बार फिर तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में होना अच्छा लगता है....
तुम्हारा वो रूठना और फिर मान जाना अच्छा लगता है...
मुझे तुमसे हार जाना अच्छा लगता है.....

( तुम आज क्या आज भी रसोई में रहोगी...
तुमने आज के लिए भी ऑफिस से छुट्टी क्यूँ नहीं ली..... मुझे नहीं मालूम जल्दी आ जाना बस......
तो बोलो "आज फिर पार्टी घर पर या बाहर.... क्या पहनूँ....
अरे ! इतनी देर अब चलो भी ... (यहाँ /वहाँ ) कौन है 'तुम्हें' देखने वाला 'मेरे सिवा'......)

सिर्फ यादें हैं....

एक बात बांटनी थी तुमसे आज,
ये जो तुम रोज़ इधर उधर मेरे बारे पूछते रहते हो,
तो सोचा चलो मैं ही बता देता हूँ, कि,
मेरी उदासी की वज़ह अब,
'तुम' बिलकुल भी नहीं, सिर्फ यादें हैं,
भीगी चौखट की,
मेज पर सूखे फूलों की,
इस ओर के रेगिस्तान की
इस राख से उठते कश की
कल जो भी कुछ मैंने गाया और,
आज मैं जो भी कुछ लिखता हूँ,
उस की वज़ह अब, 'तुम' बिलकुल भी नहीं, सिर्फ यादें हैं.....