जिन्हें दिन रात हम यू तड़प कर याद करते है
कभी सोचा ना था मिलने पे वो हमसे नाम पुछेगे..
"सुनो वो तुम हो जिससे मै बात करती थी..
कभी रस्ते पे मिलते थे? कभी तुम पीछा करते थे?
जिसे मै पागल समझती थी और अक्सर मुस्कुराती थी
वो पिछली सीट पे बैठे जो अक्सर घुरा करता था ..
कभी जो आँख मिल जाये तो सरमा सा जाता था,
वो जिसको देखकर सारी सहेलियाँ बात करती थी
वो अक्सर बात करती थी "तेरा पागल नहीं आया ..
कभी मै टाल देती थी कभी मै मुस्कुराती थी
वो जिसको देख कर मै अक्सर कुछ भूल जाती थी ..
अब आये हो तो कहते हो तुम्हें मै प्यार करता था..
हाँ पागल था दिवाना था कभी कुछ बोल ना पाया ..
चलो अब छोड़ भी दो बात बचपन की पुरानी है
समय तेज़ी से यू बदला की अब बातें पुरानी है
थी उमर बस सोलह की ,बात उसकी निराली थी
उसे क्या याद करना जो कभी वापस न आयेगा ..
बस रहने दो ..चलो छोड़ो ,पर अच्छा ये बताओ तो
वो मेरे घर के मोड़ के आगे एक मन्दिर भी आता था?
तुम उसके आगे को जाते थे, मै अक्सर सोचा करती थी
कभी पुछा नहीं कि कितने पास रहते हो कि कितनी दूर जाते हो,
तुम्हारा यू मेरे घर होली पे आ जाना
मेरी साँसों का रूक जाना अभी भी याद आता है ,
तुम पागल थे ? किसी के घर कोई एेसे भी जाता है
अभी भी सोचती हु तो अक्सर काँप जाती हु
वो मेरा भईया था जो बात दब गयी वरना
मेरे जो बाप से मिलते मोहब्बत भूल जाते तुम
अरे हाँ वो greeting card का क़िस्सा
भी कितना बचकाना था ,
पूरे स्कूल में मैंने उसे सबसे छिपाया था
तुम्हारी चोकलेट जो थी मै ही नहीं खायी
चलो अच्छा कभी मिलना तो तुम फिर से देदेना
मै अबकी बार उसको खा के देखुंगी ,
तुम्हारा प्यार मीठा था, क्या अब भी उतना ही मीठा है .
चलो अच्छा लगा कि तुम लौट आये हो
तुम्हारे साथ बचपन की यादें लौट आयी तो
कभी बैठेंगे तो तुमको तो फिर बतायेंगे
बड़ी ही मुश्किलों के पार जीवन को बसाया है
दो छोटे फ़ूल है बगीया में जिनको सजाया है
उन्हीं को सींचना है और उनको बनना है
सुनो .....अच्छा चलो सब भूल जाओ अब
मुझे एक बात कहनी है -जो जीवन से है सीखी ..
फिर मिलेंगे ... किसी मोड़ पे ..तब तक खुश रहो ..
कभी सोचा ना था मिलने पे वो हमसे नाम पुछेगे..
"सुनो वो तुम हो जिससे मै बात करती थी..
कभी रस्ते पे मिलते थे? कभी तुम पीछा करते थे?
जिसे मै पागल समझती थी और अक्सर मुस्कुराती थी
वो पिछली सीट पे बैठे जो अक्सर घुरा करता था ..
कभी जो आँख मिल जाये तो सरमा सा जाता था,
वो जिसको देखकर सारी सहेलियाँ बात करती थी
वो अक्सर बात करती थी "तेरा पागल नहीं आया ..
कभी मै टाल देती थी कभी मै मुस्कुराती थी
वो जिसको देख कर मै अक्सर कुछ भूल जाती थी ..
अब आये हो तो कहते हो तुम्हें मै प्यार करता था..
हाँ पागल था दिवाना था कभी कुछ बोल ना पाया ..
चलो अब छोड़ भी दो बात बचपन की पुरानी है
समय तेज़ी से यू बदला की अब बातें पुरानी है
थी उमर बस सोलह की ,बात उसकी निराली थी
उसे क्या याद करना जो कभी वापस न आयेगा ..
बस रहने दो ..चलो छोड़ो ,पर अच्छा ये बताओ तो
वो मेरे घर के मोड़ के आगे एक मन्दिर भी आता था?
तुम उसके आगे को जाते थे, मै अक्सर सोचा करती थी
कभी पुछा नहीं कि कितने पास रहते हो कि कितनी दूर जाते हो,
तुम्हारा यू मेरे घर होली पे आ जाना
मेरी साँसों का रूक जाना अभी भी याद आता है ,
तुम पागल थे ? किसी के घर कोई एेसे भी जाता है
अभी भी सोचती हु तो अक्सर काँप जाती हु
वो मेरा भईया था जो बात दब गयी वरना
मेरे जो बाप से मिलते मोहब्बत भूल जाते तुम
अरे हाँ वो greeting card का क़िस्सा
भी कितना बचकाना था ,
पूरे स्कूल में मैंने उसे सबसे छिपाया था
तुम्हारी चोकलेट जो थी मै ही नहीं खायी
चलो अच्छा कभी मिलना तो तुम फिर से देदेना
मै अबकी बार उसको खा के देखुंगी ,
तुम्हारा प्यार मीठा था, क्या अब भी उतना ही मीठा है .
चलो अच्छा लगा कि तुम लौट आये हो
तुम्हारे साथ बचपन की यादें लौट आयी तो
कभी बैठेंगे तो तुमको तो फिर बतायेंगे
बड़ी ही मुश्किलों के पार जीवन को बसाया है
दो छोटे फ़ूल है बगीया में जिनको सजाया है
उन्हीं को सींचना है और उनको बनना है
सुनो .....अच्छा चलो सब भूल जाओ अब
मुझे एक बात कहनी है -जो जीवन से है सीखी ..
ये जीवन है यहाँ एेसे ही होता है
जिन्हें हम चाहते है वो अक्सर दुर होता है
फिर मिलेंगे ... किसी मोड़ पे ..तब तक खुश रहो ..
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