शादी की सालगिरह मुबारक......!
(एक मित्र ने कहा तुम मुझे कुछ लिखकर दो.... मेरी शादी की सालगिरहा है........)
'एक नई' लाल सुर्ख जरी से कढ़ी साड़ी से बंधी सजी कहानी के पहले पन्ने से लिखते पढ़ते ...
कभी आटे में पानी सी घुली, गूँदी बेली...
कभी सर्दी गर्मी के बिखरे समेटे कपड़ों में उलझी सुलझी.... धूप ढूंढ तो कभी छांव में फैलाई...
कुछ बंद बक्से सी, कुछ खुली अलमारी या फिर कार की एन मौके खोयी चाबियों सी....
कभी कपड़ों पर चम्मच से गिरे दाग पर खुलकर हँसती...
बिस्तर पर फैले बिखरे कोट और पेंट पर लड़ती रूठती...
'तुम्हें पहाड़ों पर जाने की ज़िद और मुझे समंदर तक...',और न जाने कितनी ऐसी ही छोटी छोटी बातों पर बहस कभी खींची,
कभी हंस कर खत्म की है .......
बड़ी बात कब कह पाये हम एक दूसरे से......
कितने फांसले तय कर लेते हें दो अजनबी उस एक रोज़ के बाद....
उस रोज़ से फिर हर रोज़ और इस रोज़ तक लिखी हर छोटी बड़ी स्मृति मुबारक.......
तुम्हें शादी की सालगिरह मुबारक.....
सच ये की तुम्हारे साथ बच्चों से सपने ले 'जी' है ज़िंदगी......
जिसमें कभी रूठी तो कभी मनाई है ज़िंदगी...
ये दिन बहुत भला लगता है.... इस रोज़ मुझे तुम जो मिले हो .....
इस रोज़ एक बार फिर तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में होना अच्छा लगता है....
तुम्हारा वो रूठना और फिर मान जाना अच्छा लगता है...
मुझे तुमसे हार जाना अच्छा लगता है.....
( तुम आज क्या आज भी रसोई में रहोगी...
तुमने आज के लिए भी ऑफिस से छुट्टी क्यूँ नहीं ली..... मुझे नहीं मालूम जल्दी आ जाना बस......
तो बोलो "आज फिर पार्टी घर पर या बाहर.... क्या पहनूँ....
अरे ! इतनी देर अब चलो भी ... (यहाँ /वहाँ ) कौन है 'तुम्हें' देखने वाला 'मेरे सिवा'......)
(एक मित्र ने कहा तुम मुझे कुछ लिखकर दो.... मेरी शादी की सालगिरहा है........)
'एक नई' लाल सुर्ख जरी से कढ़ी साड़ी से बंधी सजी कहानी के पहले पन्ने से लिखते पढ़ते ...
कभी आटे में पानी सी घुली, गूँदी बेली...
कभी सर्दी गर्मी के बिखरे समेटे कपड़ों में उलझी सुलझी.... धूप ढूंढ तो कभी छांव में फैलाई...
कुछ बंद बक्से सी, कुछ खुली अलमारी या फिर कार की एन मौके खोयी चाबियों सी....
कभी कपड़ों पर चम्मच से गिरे दाग पर खुलकर हँसती...
बिस्तर पर फैले बिखरे कोट और पेंट पर लड़ती रूठती...
'तुम्हें पहाड़ों पर जाने की ज़िद और मुझे समंदर तक...',और न जाने कितनी ऐसी ही छोटी छोटी बातों पर बहस कभी खींची,
कभी हंस कर खत्म की है .......
बड़ी बात कब कह पाये हम एक दूसरे से......
कितने फांसले तय कर लेते हें दो अजनबी उस एक रोज़ के बाद....
उस रोज़ से फिर हर रोज़ और इस रोज़ तक लिखी हर छोटी बड़ी स्मृति मुबारक.......
तुम्हें शादी की सालगिरह मुबारक.....
सच ये की तुम्हारे साथ बच्चों से सपने ले 'जी' है ज़िंदगी......
जिसमें कभी रूठी तो कभी मनाई है ज़िंदगी...
ये दिन बहुत भला लगता है.... इस रोज़ मुझे तुम जो मिले हो .....
इस रोज़ एक बार फिर तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में होना अच्छा लगता है....
तुम्हारा वो रूठना और फिर मान जाना अच्छा लगता है...
मुझे तुमसे हार जाना अच्छा लगता है.....
( तुम आज क्या आज भी रसोई में रहोगी...
तुमने आज के लिए भी ऑफिस से छुट्टी क्यूँ नहीं ली..... मुझे नहीं मालूम जल्दी आ जाना बस......
तो बोलो "आज फिर पार्टी घर पर या बाहर.... क्या पहनूँ....
अरे ! इतनी देर अब चलो भी ... (यहाँ /वहाँ ) कौन है 'तुम्हें' देखने वाला 'मेरे सिवा'......)
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